बाज़ारवाद और आज की रेलमपेल भरी ज़िन्दगी कैसे ''ग़ालिब'' जैसे ज़लाली व्यक्ति को भी अपनी आगोश में ले सकती है यह दिखाया गया है ''ग़ालिब इन न्यू डेल्ही'' में. ग़ालिब के यौमे विलादत अर्थात जन्मदिवस 27 दिसंबर के उपलक्ष्य में आई.सी.सी.आर(इंडियन कौंसिल फॉर कल्चरल रिलेशंस) ने इंडियन इस्लामिक सेंटर के ऑडिटोरियम में इस हास्ये नाटक का मंचन करवाया. ऑडिटोरियम के दरवाज़े पर पंजों के बल खड़े होकर मैंने इस नाटक को देखा तो इससे आप अंदाज़ा तो लगा ही सकते हैं की सभागार के अन्दर क्या हाल रहा होगा. तो वहां से मैं अब नाटक पर आता हूँ.
ग़ालिब फिर दुनिया में आ चुके हैं.मेरा मतलब देहली में आ चुके हैं वही देहली जहाँ पर उन्होंने अपने अजीमों तरीन शेर लिखे और ज़माने को अलग-अलग तरह से बदलते देखा .लेकिन अब वह क्या देखते हैं 150 साल बाद तो यहाँ का नज़ारा ही कुछ और है.उनकी देहली अब न्यू डेल्ही हो चुकी है और जमा मस्जिद का बल्लीमारान इलाका कहीं गलीओ में गुम हो चुका है. लेकिन उन्हें मालूम होता है की जीते जी तो वह इतना नाम न कमा सके लेकिन मरने के बाद तो उनका दर्जा बहुत बुलंद हो चुका है तो वह अपनी पहचान पाने के लिए निकल पड़ते हैं. ग़ालिब को पुरानी देहली में तो रहने के लिए कोई जगह नहीं मिलती लेकिन उन्हें लक्ष्मी नगर में एक बिहारी रूम पार्टनर मिलता है जिसके साथ वह रहते हैं.और फिर अपनी पहचान पाने निकल पड़ते हैं अपने रूम पार्टनर के साथ जिसका नाम जय हिंद है जिसे ग़ालिब हिंदुस्तान जिंदाबाद कहकर पुकारते है.इसी दौरान उनका सामना आज के दौर मे चल रहे मसाईलो से होता है जो नाटक मे दर्शको को पलक तक झपकने का मौका नहीं देते. ग़ालिब अपनी पहचान पाने के लिए प्रेस से लेकर ऐड एजेंसी का सहारा लेते हैं.लेकिन थक हार के अंत में वह अपने आप को ही बदल डालते है क्यूंकि ये संसार एक मार्किट जो ठहरा वह ग़ालिब को भी खरीद सकता है.
भ्रष्टाचार,पलायन वाद और आज के भाषाई परिद्रश्य को लेखक ने बड़ी सुन्दरता के साथ परोसा है. ग़ालिब जहाँ घूसखोर पुलिस वाले से मिलते हैं वहीँ उनका सामना हरियाणवी कंडक्टर और बिहारी रूम पार्टनर से होता है तो आप समझ सकते हैं की ग़ालिब जैसे उर्दू भाषी व्यक्ति को क्या क्या समस्याएं आई होंगी? लेकिन वह खुद उसमे ढल जाते है और अंग्रेजी.पंजाबी और बिहारी(भोजपुरी मिश्रित हिंदी) बोलते हैं.लेखक ने समसामायिक मुदों से भी दर्शकों को बांधे रखा है.भाषाओं से जो चुटीला वातावरण पैदा किया गया है वह केवल बार बार हंसने पर मजबूर करता है.
निर्देशन एम्.सईद का है जिन्होंने स्वयं मंच पर भी ''ग़ालिब'' को जिया है बाकी कलाकारों की अदाकारी भी ग़ज़ब की रही है.मंच पर तिनका भर भी भूल ढूँढने से भी नहीं मिलती. सईद साब की अदाकारी और कलाकारी दोनों ही लाजवाब ठहरी हैं जिस पर केवल ''बहुत खूब'' कहते रहने का मन करता है............
बहुत खूब है तुम्हारा लेखन भी......
ReplyDeleteधन्यवाद दोस्त....
ReplyDeleteमज़ा आ गई भाई जान..... उस नाटक के बाद आपका ब्लॉग...जैसे बिरयानी के बाद गोल्ड फ्लेक...
ReplyDeletebohot acha likha hai...keep it up
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