इन सभी राज्यों में एक राज्य पूर्वोतर क्षेत्र का भी है. यह वही पूर्वोतर क्षेत्र है जिसे शेष भारत से अलग समझा जाता है और चीन इसके अधिकतर क्षेत्रों को अपने हिस्से में दिखता है. भेदभाव का यह आलम है कि मणिपुर राज्य में जहाँ आगामी चुनाव होने वाले हैं वहाँ भी राजनीतिक पार्टियों का रवय्या सुस्ती भरा है. यहाँ के लोगों को शेष भारत में नेपाली समझा जाता है और यह भी अपने आप को ऐसा समझ लेते हैं. कमियां दोनों तरफ हैं क्योंकि एक सिक्के के दो पहलू होते हैं.
इस लेख को मेरा इरादा उस ओर ले जाने का नहीं है जहाँ आप समझ रहे हैं. राजनीति और अधिकारों कि बातें होती रहीं हैं और होती रहेंगी. हम तो कला प्रेमी हैं और इस ओर किसी का ध्यान कभी नहीं जाता. अगर कला के हिसाब से देखा जाए तो ये क्षेत्र बहुत सम्रध है लेकिन तब भी क्यूँ यह क्षेत्र सदैव ही भारतीय फिल्म जगत से कटा रहा है. इसका दोष हमें किसे देना चाहिए लेखक को निर्देशक को या पूरे के पूरे फिल्म जगत को. भारतीय सिनेमा के परदे पर इस क्षेत्र को ज़्यादा जगह नहीं दी गई. बल्कि नेपाल जैसी जगहों को दिखाया गया है. लेकिन अब कैमरे का एंगल पश्चिमी देशों कि तरफ ज़्यादा मुड गया है. पूर्वोत्तर क्षेत्र हर मामले में अव्वल है लेकिन तब भी वहाँ किसी फिल्म की शूटिंग होते नहीं दिखाई देती.
अगर पूर्वोत्तर की जनता कि फिल्म जगत में प्रतिनिधित्व कि बात करें तो हमें केवल एक नाम का व्यक्ति दिखाई देता था जो अब दिखाई भी नहीं देता 'डैनी डेंजोग्पा'. वहाँ के लोगों को फिल्म उद्योग में ज़्यादा जगह नहीं दी गई और अगर दी भी गई तो डैनी जैसे कलाकार खलनायक के किरदार में सिमट कर रह गए. फिल्म अग्निपथ ( अमितभ बच्चन वाली) हमेशा दो किरदारों के लिए याद की जाती रही है एक विजय दीनानाथ चौहान और दूसरा कांचा चीना और आगामी अग्निपथ (ऋतिक रोशन वाली) तो केवल ऋतिक के लिए ही देखी जायेगी. क्योंकि इसमें कांचा है चीना नहीं. पूर्वोत्तर को हम सिनेमा में जगह नहीं देंगे तो कहा देंगे ये एक बहुत ही मूल प्रश्न है. फिल्म जगत अपने आप को वहाँ से काटे रख रहा है जो उचित नहीं है क्यूंकि कला ही एक ऐसा माध्यम है जो दो दिलों को पास लाता है चाहे उसकी ज़बान कुछ भी हो..........