Wednesday, December 28, 2011

न्यू डेल्ही में, मैं और ''ग़ालिब''

                 बाज़ारवाद और आज की रेलमपेल भरी ज़िन्दगी कैसे ''ग़ालिब'' जैसे ज़लाली व्यक्ति को भी अपनी आगोश में ले सकती है यह दिखाया गया है ''ग़ालिब इन न्यू डेल्ही'' में. ग़ालिब के यौमे विलादत अर्थात जन्मदिवस  27 दिसंबर के उपलक्ष्य में आई.सी.सी.आर(इंडियन कौंसिल फॉर कल्चरल रिलेशंस) ने इंडियन इस्लामिक सेंटर के ऑडिटोरियम में इस हास्ये नाटक का मंचन करवाया. ऑडिटोरियम के दरवाज़े पर पंजों के बल खड़े होकर मैंने इस नाटक को देखा तो इससे आप अंदाज़ा तो लगा ही सकते हैं की सभागार के अन्दर क्या हाल रहा होगा. तो वहां से मैं अब नाटक पर आता हूँ.  
                  ग़ालिब फिर दुनिया में आ चुके हैं.मेरा मतलब देहली में आ चुके हैं वही देहली जहाँ पर उन्होंने अपने अजीमों तरीन शेर लिखे और ज़माने को अलग-अलग तरह से बदलते देखा .लेकिन अब वह क्या देखते हैं 150 साल बाद तो यहाँ का नज़ारा ही कुछ और है.उनकी देहली अब न्यू डेल्ही हो चुकी है और जमा मस्जिद का बल्लीमारान इलाका कहीं गलीओ में गुम हो चुका है. लेकिन उन्हें मालूम होता है की जीते जी तो वह इतना नाम न कमा सके लेकिन मरने के बाद तो उनका दर्जा बहुत बुलंद हो चुका है तो वह अपनी पहचान पाने के लिए निकल पड़ते हैं. ग़ालिब को पुरानी देहली में तो रहने के लिए कोई जगह नहीं मिलती लेकिन उन्हें लक्ष्मी नगर में एक बिहारी रूम पार्टनर मिलता है जिसके साथ वह रहते हैं.और फिर अपनी पहचान पाने निकल पड़ते हैं अपने रूम पार्टनर के साथ जिसका नाम जय हिंद है जिसे ग़ालिब हिंदुस्तान जिंदाबाद कहकर पुकारते है.इसी दौरान उनका सामना आज के दौर मे चल रहे मसाईलो से होता है जो नाटक मे दर्शको को पलक तक झपकने का मौका नहीं देते. ग़ालिब अपनी पहचान पाने के लिए प्रेस से लेकर ऐड एजेंसी का सहारा लेते हैं.लेकिन थक हार के अंत में वह अपने आप को ही बदल डालते है क्यूंकि ये संसार एक मार्किट जो ठहरा वह ग़ालिब को भी खरीद सकता है.
                    भ्रष्टाचार,पलायन वाद और आज के भाषाई परिद्रश्य को लेखक ने बड़ी सुन्दरता के साथ परोसा है. ग़ालिब जहाँ घूसखोर पुलिस वाले से मिलते हैं वहीँ उनका सामना हरियाणवी कंडक्टर और बिहारी रूम  पार्टनर से होता है तो आप समझ सकते हैं की ग़ालिब जैसे उर्दू भाषी व्यक्ति को क्या क्या समस्याएं आई होंगी? लेकिन वह खुद उसमे ढल जाते है और अंग्रेजी.पंजाबी और बिहारी(भोजपुरी मिश्रित हिंदी) बोलते हैं.लेखक ने समसामायिक मुदों से भी दर्शकों को बांधे रखा है.भाषाओं से जो चुटीला वातावरण पैदा किया गया है वह केवल बार बार हंसने पर मजबूर करता है.
                     निर्देशन एम्.सईद का है जिन्होंने स्वयं मंच पर भी ''ग़ालिब'' को जिया है बाकी कलाकारों की अदाकारी भी ग़ज़ब की रही है.मंच पर तिनका भर भी भूल ढूँढने से भी नहीं मिलती. सईद साब की अदाकारी और कलाकारी दोनों ही लाजवाब ठहरी हैं जिस पर केवल ''बहुत खूब'' कहते रहने का मन करता है............

Monday, November 14, 2011

अमलों दिखावा

    एक सज्जन दोस्त मिलें, उनकी शादी होने वाली थी. मैंने फरमाया की ''भाई दो दिन रह गए हैं शादी में और आप बाहर तशरीफ़ फ़रमा हैं जाईये घर में बैठिये हल्दी-वल्दी लगवाइए रस्मों रिवाजों को अंजाम दीजिये'' तो उन्होंने तपाक से कहा ''ये रसूल की सुन्नतों के खिलाफ हैं हदीसों में इसका कोई ज़िक्र नहीं है बल्कि ये मुशरिकों का तरीका है'' मैंने मन ही मन सोचा की भई वाह चलो कोई तो मिला जो इन रस्मों रिवाजों के ढकोसलों को जूतियों पर रखता हो. मेरी नज़र उनके घर के दरवाज़े पर पड़ी तो मैंने उनसे पूछ लिया की ''भाई जान इस दरवाज़े को इतना चोड़ा क्यूँ करवा दिया'' तो उन्होंने झट से मुस्कुराते और साथ ही शरमाते हुए कहा की ''अरे मियां होंडा सिटी मिल रही है निक़ाह में उसे क्या बाहर रास्ते में खड़ा करेंगे उसके लिए पहले  दरबा तो बनवाएं फिर शान से घर में  खड़ी कर के  दिखाएँगे'' मैंने मन में कहा की ''भई वाह क्या खूब रसूल की सुन्नतों और हदीसों पर चल रहे हो'' मैंने सलाम किया और पतली गली पकड़ ली.......

Sunday, October 2, 2011

पहला e-लेख

बहुत दिनों से दबाव  डाला जा रहा था की अपना ब्लॉग बनाइये.तो आज मन मसोस कर ब्लॉग बना ही दिया.क्या पता इन्टरनेट कल हो न हो? आशा है आपको इसका शीर्षक पसंद आया होगा.जो ब्लॉग बनाने से पहले सबसे बड़ी दुविधा होती है .लेकिन मैंने केवल ऐसे ही बिना सोचे समझे इसका ये शीर्षक रख दिया मैं कोशिश करूँगा की इस मुठभेड़ के ज़रिये मैं आपको राजनीतिक,सामाजिक,सांस्कृतिक साहित्यिक और मनोरंजन क्षेत्र से हुयी मेरी मुठभेड़ों से आपको रूबरू करा सकूँ.
अभी नया हूँ तो मैं आपसे निवेदन करूँगा की आप मेरी गलतियों की तरफ मेरा ध्यान आकर्षित करें जिससे मैं भी अपनी त्रुटियों को समझ सकूँ और अपने आप से उम्मीद करूँगा की मैं नियमित तोर से इस पर लिख सकूँ और जो इसको बनाने का सबसे पहला उद्देश्य है वो भी पूरा हो सके.
आज दो अक्टूबर है और आज ही के दिन मैंने इसका शुभ आरम्भ  किया है गाँधी जी के बताये हुए आदर्शों पर हम चले और एक सफल राष्ट्र का निर्माण करें.
ज्यादा कुछ अब मेरे पास भी कहने को नहीं है तो अब मैं सीधा आपसे  अपनी मुठभेड़ों के माध्यम से ही रूबरू होंगा तब तक के लिए 
जय हिंद .........