एक सज्जन दोस्त मिलें, उनकी शादी होने वाली थी. मैंने फरमाया की ''भाई दो दिन रह गए हैं शादी में और आप बाहर तशरीफ़ फ़रमा हैं जाईये घर में बैठिये हल्दी-वल्दी लगवाइए रस्मों रिवाजों को अंजाम दीजिये'' तो उन्होंने तपाक से कहा ''ये रसूल की सुन्नतों के खिलाफ हैं हदीसों में इसका कोई ज़िक्र नहीं है बल्कि ये मुशरिकों का तरीका है'' मैंने मन ही मन सोचा की भई वाह चलो कोई तो मिला जो इन रस्मों रिवाजों के ढकोसलों को जूतियों पर रखता हो. मेरी नज़र उनके घर के दरवाज़े पर पड़ी तो मैंने उनसे पूछ लिया की ''भाई जान इस दरवाज़े को इतना चोड़ा क्यूँ करवा दिया'' तो उन्होंने झट से मुस्कुराते और साथ ही शरमाते हुए कहा की ''अरे मियां होंडा सिटी मिल रही है निक़ाह में उसे क्या बाहर रास्ते में खड़ा करेंगे उसके लिए पहले दरबा तो बनवाएं फिर शान से घर में खड़ी कर के दिखाएँगे'' मैंने मन में कहा की ''भई वाह क्या खूब रसूल की सुन्नतों और हदीसों पर चल रहे हो'' मैंने सलाम किया और पतली गली पकड़ ली.......
wah bhai wah kya nazariya jha kharcha karne ki bat ayi waha hadis aur sunnat yad agai aur jb lene ki bat ayi to sbko ek hi pal m tak par rakh dya....
ReplyDeleteji janab aaj ke samay me yahi nazariya to hai....
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